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14 साल बाद : वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की जमीनी हकीकत

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फरवरी 2019 में उच्चतम न्यायालय के आदेश से अमान्य दावेदारों को बेदखली ने आदिवासी अंचलों असंतोष बढ़ा दिया है, क्योंकि मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा 3 लाख 60 हजार 877 दावे अमान्य हुए थे। वन अधिकार कानून 2006 के प्रस्तावना में उल्लेख है कि औपनिवेशिक काल के दौरान तथा स्वतंत्र भारत में राज्य वनों को समेकित करते समय उनकी पैतृक भूमि पर वन अधिकारों और उनके निवास को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं दी गई थी, जिसके परिणाम स्वरूप वन में निवास करने वाली उन अनुसूचीत जनजातियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, जो वन पारिस्थितिकी प्रणाली बचाने और बनाए रखने के लिए अभिन्न अंग है। परन्तु 31 जनवरी 2020 के अनुसार मध्यप्रदेश में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के आंकड़े अन्याय को जारी रहने की ओर इशारा करते हैं। कुल 5 लाख 85 हजार 239 वयक्तिगत दावों में से मात्र 2 लाख 29 हजार 27 लोगों को अधिकार पत्र मिला है अर्थात 60 प्रतिशत दावे अमान्य किया गया है। 42 हजार 182 सामुदायिक निस्तार दावे लगे थे जिसमें से 27 हजार 970 सामुदायिक निस्तार हक्क प्राप्त हुआ है। फरवरी 2019 में उच्चतम न्याय...